रूसी तेल की कीमत अचानक रॉकेट, 13 साल की ऊंचाई पर पहुंचे दाम, भारत के लिए मतलब

Updated on 08-04-2026 12:16 PM
नई दिल्‍ली: रूसी कच्चे तेल की कीमतें 13 साल से भी ज्‍यादा के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई हैं। ईरान में जारी युद्ध और उसके कारण पैदा हुए वैश्विक तेल संकट की वजह से ऐसा हुआ है। 2 अप्रैल को रूस के 'यूराल क्रूड' के दाम बाल्टिक तट पर स्थित प्रिमोर्स्क बंदरगाह पर 116.05 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गए। रूस का यह सबसे बड़ा ऑयल एक्‍सपोर्ट टर्मिनल है। यह उस 59 डॉलर प्रति बैरल की कीमत से लगभग दोगुनी है, जिसका अनुमान रूस ने अपने 2026 के राष्ट्रीय बजट में लगाया था। रूसी तेल की कीमत में यह तेजी भारत के लिए अच्‍छी नहीं है। यह उसके लिए एक आर्थिक झटके जैसी है।

कीमतों में आई इस भारी तेजी से मॉस्को को ऐसे समय में बहुत जरूरी आर्थिक मदद मिल रही है, जब वह यूक्रेन में अपने युद्ध पर भारी खर्च कर रहा है। तेल से होने वाली ज्‍यादा कमाई क्रेमलिन के फाइनेंस पर पड़ रहे दबाव को कम करने में मदद कर रही है।

कीमतों में तेजी कारण

  • कीमतों में इस उछाल का मुख्य कारण मिडिल ईस्‍ट में आई भारी रुकावट है।
  • ईरान युद्ध ने दुनिया की लगभग 20% तेल सप्‍लाई को प्रभावी ढंग से रोक दिया है।
  • यह एनर्जी सप्‍लाई आम तौर पर होर्मुज स्‍ट्रेट से होकर गुजरती है।

ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को स्ट्रेट को फिर से खोलने के लिए एक सख्‍त डेडलाइन दी है। चेतावनी दी है कि अगर वह इसका पालन करने में विफल रहता है तो ईरान के बुनियादी ढांचे पर बड़े हमले किए जाएंगे।

क‍ितने पर बोली जा रही रूसी तेल की कीमत?

रूस के काला सागर बंदरगाह नोवोरोस्सिय्स्क में भी यूराल क्रूड की कीमत बढ़कर 114.45 डॉलर प्रति बैरल हो गई। ग्‍लोबल बेंचमार्क 'डेटेड ब्रेंट' की तुलना में रूसी यूराल पर मिलने वाली छूट में भारी कमी आई है। यह पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल की मजबूत मांग को दिखाता है।

दिलचस्प बात यह है कि जब तक रूसी यूराल क्रूड भारत पहुंचता, तब तक इसकी कीमत ब्रेंट की तुलना में 6.1 डॉलर प्रति बैरल ज्‍यादा हो जाती है जो सिर्फ दो हफ्ते पहले 3.9 डॉलर थी।

फायदे के साथ कुछ समस्‍याएं भी

हालांकि, रूस को हो रहे इस फायदे के साथ कुछ समस्याएं भी जुड़ी हैं। यूक्रेनी सेनाओं ने रूसी तेल के बुनियादी ढांचे पर, विशेष रूप से बाल्टिक तट पर स्थित बंदरगाहों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों को तेज कर दिया है। इन्हीं बंदरगाहों से रूस के समुद्री मार्ग से होने वाले कच्चे तेल के निर्यात का लगभग 40% हिस्सा भेजा जाता है।
इन हमलों के कारण तेल की लोडिंग में देरी हो रही है। ये आंशिक रूप से रूस की उस क्षमता को सीमित कर रहे हैं, जिसके तहत वह तेल की ऊंची कीमतों का पूरा फायदा उठा सकता है।

अभी भी बनी हुई अन‍िश्‍च‍ितता

हालांकि, ईरान संघर्ष के चलते तेल की कीमतों में आई इस मौजूदा वैश्विक तेजी को लेकर अभी भी काफी अनिश्चितता बनी हुई है। लेकिन, विश्लेषकों का कहना है कि रूस को इस स्थिति से भारी फायदा मिल रहा है।जब तक ईरान संघर्ष के कारण होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट बनी रहेगी, तब तक विश्लेषकों को उम्मीद है कि रूसी कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर ही बनी रहेंगी, यह दिखाता है कि किस तरह किसी एक स्थान पर मौजूद भू-राजनीतिक तनाव, हजारों मील दूर स्थित ऊर्जा बाजारों और सरकारी राजस्व को काफी हद तक प्रभावित कर सकते हैं।

भारत के लिए मतलब

रूसी तेल की कीमतों में तेजी का मतलब है:
  • भारत के पास उपलब्ध सस्ते ईंधन का विकल्प अब खत्म होता जा रहा है।
  • इससे देश के आयात बिल में भारी बढ़ोतरी होने की आशंका है।
  • यह स्थिति भारत के राजकोषीय घाटे को सीधे तौर पर बढ़ाएगी।
  • घरेलू बाजार में पेट्रोल, डीजल और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतों में भी उछाल ला सकती है।
  • पहले से ही पश्चिम एशिया संकट के कारण कीमतों पर दबाव बना हुआ है।

यूक्रेन युद्ध की शुरुआत में रूस भारत को 20-30 डॉलर प्रति बैरल की छूट दे रहा था। अब छूट लगातार गुम होती जा रही है। कीमतों में तेजी का मतलब है कि रूस से तेल खरीदना अब सऊदी अरब या इराक से तेल खरीदने जितना ही महंगा पड़ता जा रहा है। इससे भारत की 'सस्ती ऊर्जा' वाली रणनीति कमजोर हो रही है।

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