लो प्रेशर दे रहा हाई टेंशन, कतर को पड़ी मार का भारत पर असर, आगे बिगड़ती दिख रही तस्‍वीर

Updated on 07-04-2026 12:40 PM
नई दिल्‍ली: भारत की चुनौतियां हर दिन बढ़ने लगी हैं। इसके तार हजारों मील दूर चल रहे भीषण युद्ध से अपने आप जुड़ जाते हैं। एलपीजी सिलेंडरों के लिए लगी लाइनें देश देख चुका है। अब कई घरों में एक और बात नजर आने लगी है। पाइप से आने वाली नैचुरल गैस (पीएनजी) के कनेक्शन में प्रेशर थोड़ा कम हो गया है। खासकर खाना बनाने के पीक घंटों में। यानी गैस की फ्लेम धीमी हो चुकी है। फाइनेंशियल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दूर कतर के रास लफान और मुश्किलों से घिरे होर्मुज स्ट्रेट में जो कुछ हो रहा है, उसका असर धीरे-धीरे भारत की आम रसोई और फैक्ट्रियों पर पड़ने लगा है। रास लफान दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी एक्सपोर्ट टर्मिनल है।

भारत के लिए यह क्यों मायने रखता है?

  • भारत अपनी नैचुरल गैस की जरूरतों के लिए पश्चिमी एशिया पर बहुत ज्‍यादा निर्भर है:
  • भारत का 41-47% एलएनजी इंपोर्ट आम तौर पर कतर से होता है, जो ज्‍यादातर रास लफान से लोड होता है।
  • 50% से ज्‍यादा एलएनजी कार्गो होर्मुज स्‍ट्रेट से होकर गुजरते हैं।
  • इसी तरह लगभग 90% एलपीजी इंपोर्ट होर्मुज स्ट्रेट के रास्‍ते से होता है।

इन इलाकों में किसी भी तरह की रुकावट से भारत की एनर्जी सप्लाई में तुरंत हलचल मच जाती है।

बिगड़ते जा रहे हालात

एलएनजी इंपोर्ट में पहले ही भारी गिरावट आ चुकी है। मार्च में भारत ने सिर्फ 16.8 लाख टन एलएनजी इंपोर्ट किया। यह फरवरी के मुकाबले 12.5% कम है। कतर का हिस्सा लगभग 40% से गिरकर सिर्फ 3.6% रह गया।
इंडस्ट्रियल यूजर्स को सबसे पहले इसकी मार झेलनी पड़ रही है। कई इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स में पीएनजी की सप्लाई को सामान्य स्तर से घटाकर 55-65% कर दिया गया है। कीमतें बढ़ गई हैं। कुछ जगहों पर इंडस्ट्रियल पीएनजी की कीमत अब 115 रुपये प्रति स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर से ज्‍यादा हो गई है।

घर की रसाई में दिखने लगा है असर

वैसे तो सरकार घरेलू यूजरों को प्राथमिकता दे रही है। फिर भी दिल्ली-एनसीआर जैसे शहरों के कुछ घरों से शिकायतें आ रही हैं कि शाम के समय गैस की लौ कमजोर हो गई है। खाना बनाने में ज्‍यादा समय लग रहा है।

नोएडा के एक निवासी ने कहा, 'पिछले कुछ दिनों से गैस की लौ काफी कमजोर हो गई है, खासकर सुबह और शाम के समय।'
हालात अभी भी काबू में हैं। यह समस्या बड़े पैमाने पर नहीं फैली है। लेकिन, एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि अगर यह रुकावट लंबे समय तक बनी रही तो सिटी गैस नेटवर्क्स पर और भी ज्‍यादा दबाव पड़ सकता है।

एक्सपर्ट्स क्या कह रहे हैं?

इंडस्ट्री के एक एक्सपर्ट ने नाम न बताने की शर्त पर समझाया कि सिटी गैस नेटवर्क्स बहुत ही बारीक सप्लाई-डिमांड संतुलन पर चलते हैं। अगर कतर से आने वाले एलएनजी कार्गो में लंबे समय तक रुकावट बनी रहती है तो सबसे पहले इंडस्ट्रियल सप्लाई में कटौती की जाती है। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो घरेलू पीएनजी की सप्लाई पर भी दबाव पड़ सकता है।

उन्होंने यह भी बताया कि हाल के महीनों में पीएनजी कनेक्शन को लेकर सरकार के जोरदार अभियान की वजह से इसकी मांग में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। कई इलाकों में इतने सारे नए यूजरों के लिए एक साथ 'लास्ट-माइल' पाइपलाइन इन्‍फ्रास्ट्रक्चर तैयार नहीं था। जनवरी 2026 तक भारत में 1.65 करोड़ पीएनजी कनेक्शन थे। इनमें से 1.03 करोड़ चालू हैं। मार्च से अब तक 3.6 लाख और कनेक्शन जोड़े गए हैं।

समस्‍या से कैसे निपट रही है सरकार?

  • अधिकारी कई मोर्चों पर काम कर रहे हैं। इनमें शामिल हैं:
  • एलएनजी के स्रोतों में विविधता लाना (अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका)
  • और ज्‍यादा स्पॉट कार्गो खरीदना
  • घरेलू गैस उत्पादन बढ़ाना
  • घरों और जरूरी क्षेत्रों को सप्‍लाई में प्राथमिकता देना

पेट्रोनेट एलएनजी जैसी सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां और ऑयल मार्केटिंग कंपनियां शिपमेंट को फिर से शेड्यूल कर रही हैं। कमी को पूरा करने की कोशिश की जा रही है। यह सिर्फ एक छोटी अवधि की समस्या नहीं है। भारत खाना पकाने, परिवहन, उर्वरक उत्पादन और उद्योग के लिए आयातित गैस पर तेजी से निर्भर होता जा रहा है।

रूस-यूक्रेन युद्ध ने पहले ही तेल क्षेत्र में कमजोरियों को उजागर कर दिया था। अब मिडिल ईस्‍ट संकट गैस के मामले में भी यही कर रहा है। अभी के लिए स्थिति नियंत्रण में है। घरों को अभी भी सुरक्षित रखा जा रहा है। लेकिन, रास लाफान और होर्मुज में रुकावटें हफ्तों या महीनों तक जारी रहती हैं तो दबाव और बढ़ सकता है। औद्योगिक क्षेत्रों से लेकर देश भर के और भी ज्‍यादा रसोईघरों तक इसका असर दिखेगा। ऐसे में आने वाले हफ्ते बहुत अहम होंगे।

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